सुमेरपुर नगरपालिका के 51 साल के इतिहास में कई रोचक पड़ाव, 15 पार्षदों से शुरू हुआ सफर अब 35 सदस्यीय बोर्ड तक पहुंचा
सुमेरपुर। सुमेरपुर नगर पालिका का इतिहास अपने गठन से लेकर अब तक कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव और रोचक घटनाओं का गवाह रहा है। करीब 51 साल पहले 1 अप्रैल 1975 को तत्कालीन ग्राम पंचायत सुमेरपुर को नगर पालिका में परिवर्तित किया गया था। खास बात यह रही कि नगर पालिका बनने के समय किसी तरह का प्रत्यक्ष चुनाव नहीं हुआ और ग्राम पंचायत के तत्कालीन सरपंच सुखराज जैन ही नगर पालिका के पहले अध्यक्ष बन गए।
समय के साथ नगर पालिका का स्वरूप और राजनीतिक समीकरण लगातार बदलते गए। शुरुआती दौर में 15 पार्षदों से शुरू हुई नगर पालिका में 1986 में 18 पार्षद हुए। इसके बाद 1999 में 20, 2009 में 25 और वर्ष 2019 में पार्षदों की संख्या बढ़कर 35 हो गई।
अब एक बार फिर सुमेरपुर की राजनीति में नगर पालिका बोर्ड को लेकर हलचल तेज है। 11 सितंबर को पार्षद पद के लिए मतदान होने के बाद 21 सितंबर को पालिकाध्यक्ष का चुनाव प्रस्तावित है। मतदान के 10 दिन और परिणाम के करीब 7 दिन बाद 35 सदस्यीय नया बोर्ड अस्तित्व में आएगा। ऐसे में शहर में राजनीतिक गतिविधियां और चुनावी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
1975 में ग्राम पंचायत से नगर पालिका बनी, सरपंच सुखराज जैन बने पहले अध्यक्ष
नगर पालिका बनने से पहले सुमेरपुर में ग्राम पंचायत का शासन था। 1 अप्रैल 1975 को पंचायत को नगर पालिका में परिवर्तित किया गया। उस समय ग्राम पंचायत के सरपंच सुखराज जैन थे। नगर पालिका के गठन के साथ ही उन्हें पालिकाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिल गई।
हालांकि उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं रहा। कुछ समय बाद उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। इसके बाद राजस्थान सरकार की ओर से चुन्नीलाल परिहार को मनोनीत कर नगर पालिका का प्रथम चेयरमैन बनाया गया।
चुन्नीलाल परिहार का कार्यकाल 29 जुलाई 1977 तक रहा। इसके बाद नगर पालिका में लंबे समय तक निर्वाचित बोर्ड के बजाय प्रशासकीय व्यवस्था रही।
करीब 9 साल रहा एसडीओ का प्रशासक काल
चुन्नीलाल परिहार के कार्यकाल के बाद नगर पालिका की कमान उपखंड अधिकारी प्रशासन के हाथों में रही। यह व्यवस्था 30 जुलाई 1977 से 29 जुलाई 1986 तक करीब नौ वर्ष चली।
इसके बाद भी नगर पालिका को लगातार निर्वाचित अध्यक्ष नहीं मिला। 28 जुलाई 1989 से 29 नवंबर 1994 तक करीब पांच वर्ष तक बाली के उपखंड अधिकारी ने प्रशासक के रूप में नगर पालिका का संचालन किया।
सुमेरपुर में अलग से एसडीएम पद का अस्तित्व वर्ष 2002 में आया। इससे पहले प्रशासनिक व्यवस्था में बाली के एसडीएम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
1986 में पहली बार हुआ चुनाव, बराबर आए भाजपा-कांग्रेस के पार्षद
नगर पालिका के इतिहास में वर्ष 1986 एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। जुलाई 1986 में नगर पालिका के चुनाव करवाए गए। उस समय बोर्ड में कुल 18 पार्षद थे।
चुनाव परिणाम में भाजपा और कांग्रेस दोनों के खाते में 9-9 पार्षद आए। यानी दोनों दलों की स्थिति बराबर रही। उस समय राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और सुमेरपुर की विधायक बीना काक मंत्री थीं।
अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान एक पार्षद की क्रॉस वोटिंग ने पूरा राजनीतिक समीकरण बदल दिया। एक वोट के अंतर से भाजपा के पक्ष में बोर्ड बन गया और 30 जुलाई 1986 को मीठालाल बोहरा नगर पालिका के पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने।
बराबर संख्या के कारण बोर्ड में प्रस्ताव पारित करवाना चुनौतीपूर्ण था। हालांकि ऐसी स्थिति में अध्यक्ष को अपना एक अतिरिक्त निर्णायक वोट देने का अधिकार था। इसी व्यवस्था के कारण अध्यक्ष को महत्वपूर्ण प्रस्तावों के दौरान निर्णायक भूमिका मिलती थी।
खास बात यह रही कि राज्य में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद मीठालाल बोहरा ने अपने कार्यकाल के करीब तीन वर्ष पूरे किए। उनका कार्यकाल 27 जुलाई 1989 तक रहा।
15 से 35 पार्षदों तक पहुंचा नगर पालिका का सफर
सुमेरपुर नगर पालिका के राजनीतिक और प्रशासनिक विस्तार के साथ पार्षदों की संख्या भी लगातार बढ़ती गई।
1975: करीब 12 से 15 पार्षद
1986: 18 पार्षद
1999: 20 पार्षद
2009: 25 पार्षद
2019: 35 पार्षद
इस तरह 1975 में शुरू हुई नगर पालिका की राजनीतिक यात्रा आज 35 सदस्यीय बोर्ड तक पहुंच चुकी है।
कभी चुंगी और हाउस टैक्स थे आय के प्रमुख साधन
नगर पालिका बनने के शुरुआती दौर में स्थानीय निकाय की आय के प्रमुख स्रोत चुंगी, हाउस टैक्स और तामीर स्वीकृतियां थे। शहर के अलग-अलग स्थानों पर चुंगी नाके भी संचालित होते थे।
समय के साथ व्यवस्था बदली और चुंगी तथा हाउस टैक्स जैसी व्यवस्थाएं समाप्त हो गईं। वर्तमान समय में नगर पालिका की आय में भूखंडों की नीलामी, भूमि रूपांतरण, निर्माण स्वीकृतियां तथा सरकार से मिलने वाले अनुदान और बजट की महत्वपूर्ण भूमिका है।
यानी पांच दशक में नगर पालिका की राजनीतिक संरचना के साथ-साथ उसकी आर्थिक व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव आया है।
अब 18वें पालिकाध्यक्ष की बारी, अध्यक्ष पद जनरल ओपन
सुमेरपुर नगर पालिका के अस्तित्व में आने के बाद अब तक 17 पालिकाध्यक्ष रह चुके हैं। इस बार अध्यक्ष पद जनरल ओपन होने के कारण किसी भी वर्ग का योग्य पार्षद अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हो सकता है।
ऐसे में आगामी चुनाव के बाद सुमेरपुर को नगर पालिका के इतिहास का 18वां पालिकाध्यक्ष मिलेगा।
पहले अध्यक्ष के रूप में सुखराज जैन का नाम नगर पालिका के इतिहास में दर्ज है। अविश्वास प्रस्ताव के बाद चुन्नीलाल परिहार मनोनीत अध्यक्ष बने। इसके बाद वर्ष 1986 में मीठालाल बोहरा नगर पालिका के पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने और उन्होंने करीब तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा किया।
2019 के बाद फिर 35 सदस्यीय बोर्ड पर निगाहें
वर्ष 2019 में नगर पालिका में पार्षदों की संख्या 25 से बढ़कर 35 हुई थी। अब आगामी चुनाव के बाद इन्हीं 35 पार्षदों में से नया बोर्ड चुना जाएगा।
पिछले चुनाव की तरह इस बार भी अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति महत्वपूर्ण रहने वाली है। पिछले चुनाव में दोनों प्रमुख दलों ने अपने पार्षदों को चुनाव परिणाम के बाद बाड़ाबंदी में रखा था। ऐसे में इस बार भी अध्यक्ष पद के लिए जोड़-तोड़, समर्थन और राजनीतिक समीकरणों पर शहर की नजर रहेगी।
51 साल की यात्रा में बदला सुमेरपुर का राजनीतिक चेहरा
सुमेरपुर नगर पालिका की 51 साल की यात्रा पर नजर डालें तो ग्राम पंचायत से नगर पालिका बनने, बिना चुनाव पहले अध्यक्ष बनने, अविश्वास प्रस्ताव, लंबे प्रशासक काल, बराबर संख्या वाले बोर्ड, क्रॉस वोटिंग से पहली बार निर्वाचित अध्यक्ष बनने और 15 से 35 पार्षदों तक पहुंचने जैसे कई महत्वपूर्ण पड़ाव सामने आते हैं।
अब 11 सितंबर के पार्षद चुनाव और 21 सितंबर के अध्यक्ष चुनाव के बाद नगर पालिका के इतिहास में एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। शहरवासियों की नजर इस बात पर है कि 35 सदस्यीय नए बोर्ड की कमान किसके हाथों में जाती है और सुमेरपुर को इतिहास का 18वां पालिकाध्यक्ष कौन मिलता है।